हैवान’ से 109 साल पहले: जब सिनेमा के शुरुआती दौर में ही शुरू हो गया था रीमेक का खेल, जानिए इतिहास

हैवान’ से 109 साल पहले: जब सिनेमा के शुरुआती दौर में ही शुरू हो गया था रीमेक का खेल, जानिए इतिहास

हैवान’ से 109 साल पहले: जब सिनेमा के शुरुआती दौर में ही शुरू हो गया था रीमेक का खेल, जानिए इतिहास

रीमेक फिल्मों का इतिहास

The History of Remake Films in India: अक्षय कुमार और सैफ अली खान स्टारर ‘हैवान’ की रिलीज के साथ ही एक बार फिर से रीमेक शब्द चर्चा में आ गया. ये फिल्म मोहनलाल और प्रियदर्शन की 2016 की मलयालम थ्रिलर ‘ओप्पम’ का हिंदी रीमेक है. आज ओटीटी के दौर में दर्शक हर भाषा का सिनेमा पहले ही सबटाइटल्स या डबिंग में देख चुके होते हैं. ऐसे में जैसे ही किसी फिल्म पर रीमेक का ठप्पा लगता है, तो लोग उसे बिना देखे ही खारिज करने लगते हैं और सोशल मीडिया पर हंगामा मच जाता है. हालांकि, दर्शक जिसे बॉलीवुड का ‘आलस’ मानते हैं, वो रीमेक कल्चर आज का नहीं, बल्कि सिनेमा के जन्म जितना ही पुराना है.

जी हां, अगर आपको भी लगता है कि ‘रीमेक’ और ‘अडेप्टेशन’ का यह चलन पिछले कुछ दशकों में शुरू हुआ कोई नया फॉर्मूला है, तो जरा ठहरिए और अपनी सिनेमाई घड़ी की सुइयों को 109 साल पीछे घुमाइए. आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में ही रीमेक की परंपरा शुरू हो गई थी. जी हां, भारत में रीमेक और पुरानी कहानियों को दोबारा पर्दे पर ढालने का सिलसिला मूक सिनेमा (साइलेंट एरा) के शुरुआती दौर यानी 1917 से ही दर्ज है.

जब दादासाहेब फाल्के ने खुद दोबारा शूट की अपनी फिल्म

इसकी शुरुआत भारत की पहली स्वदेशी पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म मानी जाने वाली ‘राजा हरिश्चंद्र’ से जुड़ी है, जिसे दादासाहेब फाल्के ने 3 मई 1913 को बॉम्बे (अब मुंबई) के कोरोनेशन सिनेमा में रिलीज किया था. फिल्म इतनी पसंद की गई कि इसे जगह-जगह ले जाकर दिखाया जाने लगा. लेकिन उस दौर में आज की तरह कोई डिजिटल सर्वर नहीं था. 1917 में फिल्म की आखिरी बची प्रिंट को जब एक थिएटर से दूसरे थिएटर ले जाया जा रहा था, तब रास्ते में गर्मी और लगातार घर्षण के कारण उस प्रिंट में आग लग गई. फिल्म की प्रिंट नष्ट होने के बाद फाल्के साहब ने हार नहीं मानी. उन्होंने लगभग उसी विजन और कलाकारों के साथ 1917 में पूरी फिल्म दोबारा शूट की, जिसे इतिहास के पन्नों में ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ के नाम से जाना गया.

दिलचस्प बात यह है कि आज उपलब्ध ‘राजा हरिश्चंद्र’ के सर्वाइविंग फुटेज को कुछ फिल्म इतिहासकार 1913 की मूल फिल्म के बजाय फाल्के द्वारा 1917 में दोबारा बनाई गई इसी फिल्म का रीमेक मानते हैं.

1917: मुंबई और कोलकाता में एक ही साल बनीं हरिश्चंद्र की दो फिल्में

1917 में सिर्फ फाल्के साहब ने ही अपनी फिल्म दोबारा नहीं बनाई, बल्कि उसी साल कलकत्ता (अब कोलकाता) के जाने-माने शोमैन जे.एफ. मदन की कंपनी ‘एल्फिंस्टन बायोस्कोप’ ने भी एक अलग फिल्म तैयार की. रुस्तमजी धोतीवाला के निर्देशन में बनी इस फिल्म का नाम भी ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ ही था, जो 24 मार्च 1917 को कलकत्ता के न्यू टेंट मैदान में रिलीज हुई थी. कई फिल्म इतिहासकार और रिकॉर्ड्स जे.एफ. मदन की इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की शुरुआती और पहली आधिकारिक रीमेक के रूप में दर्ज करते हैं. हालांकि, ये फिल्म सिर्फ फाल्के की रचना से नहीं, बल्कि उस दौर के मशहूर उर्दू स्टेज ड्रामा से भी प्रेरित थी और इसे विज्ञापनों में ‘फोटोग्राफ्ड प्ले’ तक कहा गया था. यानी 1917 में एक तरफ मुंबई में फाल्के साहब का पुनर्निर्माण चल रहा था, तो दूसरी तरफ कलकत्ता में उसी पौराणिक आख्यान पर एक अलग सिनेमाई अध्याय जन्म ले रहा था.

स्टेज से स्क्रीन और ‘देवदास’ का अमर सफर

भारतीय सिनेमा का स्वभाव ही ऐसा रहा है कि वो लोककथाओं, नाटकों और साहित्यों को बार-बार नए चश्मे से पेश करता आया है. 1931 में जब देश की पहली बोलती फिल्म (टॉकी) ‘आलम आरा’ आई, तो वह भी एक लोकप्रिय पारसी स्टेज प्ले का ही सिनेमाई रूपांतरण थी. रीमेक और नए रूपांतरणों की इस परंपरा को समझना हो तो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कालजयी उपन्यास ‘देवदास’ से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता. 1928 में नरेश मित्रा ने इस पर पहली मूक फिल्म बनाई. इसके बाद 1935 में पी.सी. बरुआ ने इसका बांग्ला वर्जन बनाया और फिर 1936 में के.एल. सहगल के साथ हिंदी वर्जन आया. यही सिलसिला आगे बढ़ा जब 1955 में बिमल रॉय ने दिलीप कुमार को लेकर ‘देवदास’ बनाई और दशकों बाद 2002 में संजय लीला भंसाली ने उसी कथा को शाहरुख खान के साथ भव्य कैनवास पर नए सिरे से रच दिया.

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इसलिए जब आज कोई ‘हैवान’ जैसी फिल्म रीमेक बनकर आती है, तो यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि सिनेमा में मौलिकता खत्म हो गई है. रीमेक या अडेप्टेशन कोई नई बीमारी नहीं, बल्कि एक सशक्त कहानी को हर पीढ़ी के तकनीकी और जज्बाती मिजाज के हिसाब से दोबारा जिंदा करने का 109 साल पुराना सिनेमाई फलसफा है.

सोनाली नाईक

सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया.

उन्होंने वहां ‘फैशनेरिया’ नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं.

सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है.

नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज ‘पानी’, ‘मेड इन चाइना’ की रीडिंग ‘आल इंडिया रेडियो’ पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

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