
एक्ट्रेस शबाना आजमी
Shabana Azmi 76th Birthday: शबाना आजमी 80s के दशक में आर्ट फिल्मों के जरिए बॉलीवुड इंडस्ट्री में स्थापित हुईं और देखते ही देखते संवेदनशील और शसक्त फिल्मों का चेहरा बन गईं. उस दौर में पैरेलल फिल्मों के लिए जिन 3 नामों की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी उसमें शबाना आजमी, स्मिता पाटिल और दीप्ति नवल का नाम शामिल था. शबाना ने अपने करियर में 5 नेशनल अवॉर्ड्स जीते हैं. यही उनकी प्रतिभा के परिचय का उल्लेख है. शबाना आजमी ने करियर में हर तरह के रोल्स प्ले किए हैं और अपनी वर्सेटाइल एक्टिंग से अलग पहचान बनाई है.
शबाना ने सीरियस रोल्स बेखूबी प्ले किए हैं वहीं वे इसी के साथ कॉमर्शियल सिनेमा में भी अपना योगदान देती रही हैं. वहीं थियेटर से तो उनका पुराना और गहरा नाता रहा ही है. एक्ट्रेस अपना 76वां जन्मदिन मना रही हैं. वैसे तो उनकी शानदार फिल्मों में से किसी 5 को भी चुन पाना टेढ़ी खीर से कम नहीं है. लेकिन इसके बाद भी एक्ट्रेस की कुछ ऐसी फिल्में जरूर हैं जिनमें उनकी परफॉर्मेंस साधारण होते हुए भी काफी असाधारण लगती है.
पार
पार फिल्म का निर्देशन गौतम घोष ने किया था और इसमें एक गरीब इंसान के जीवन के संघर्ष की कहानी दिखाई गई थी. समाजिक दृष्टिकोण की इस महीन कहानी में नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी का अभिनय काबिले तारीफ था. शबाना आजमी ने फिल्म में बेहद कम संवादों के बावजूद अपनी स्क्रीन अपीयरेंस से ही लोगों के दिल में गहरी छाप छोड़ी थी. चेहरे पर अनिश्चितता और भविष्य का भय लेकिन अपने जीवनसाथी पर भरोसा ये सब भाव चेहरे पर एक साथ लाना और पूरी फिल्म में उस भाव को बरकरार रखना भी किसी मायने में कम नहीं था.
स्पर्श
साई पारंजपे के निर्देशन में बनी स्पर्श फिल्म बताती है कि संसार को देखने के लिए जितनी जरूरत नजरों की है उससे भी ज्यादा जरूरत नजरिए की है. नजरिया ना होने का मतलब बिन शरीर की आत्मा का इंसान. स्पर्श फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने अपनी काबिलियत के बलबूते फिल्म के किरदार की आत्मा ओढ़ ली. उन्होंने किरदार को ऐसे निभाया जैसे वे वाकई में अंधे हैं लेकिन अंतरमन प्रकाशमय. उनकी आंखों की रोशनी तो उनका नजरिया था. और उनके इसी किरदार से शबाना आजमी के कैरेक्टर ने प्रेम किया. उनका किरदार अपने हमसफर को खो चुका होता है और तन्हाई से खुद को समेटे हुए होता है. लेकिन उसी तन्हाई को नसीरुद्दीन शाह के किरदार का सहारा मिलता है और होता है सच्चा स्पर्श. फिल्म में शबाना आजमी अपने किरदार में जिस तरह से एक ऐसे इंसान के प्रति आकर्षित होती हैं जो अंधा है और जिस तरह से उसे औरों से जुदा और अनोखा पाती हैं उनकी वो स्वीकृति ही किरदार की गहराई बताती है. हर किसी के लिए इतना महीन और ठहरा हुआ किरदार निभाना आसान नहीं.

मकड़ी
मकड़ी फिल्म किसी भी एक्ट्रेस द्वारा प्ले किया गया इंडियन सिनेमा के इतिहास का सबसे यूनिक रोल है. उस दौर में जब ये फिल्म आई थी तो कई लोगों को पता ही नहीं चला था कि ये रोल शबाना आजमी ने प्ले किया है. उस दौर में इतने ज्यादा प्रमोशन्स नहीं होते थे और सोशल मीडिया भी नहीं था. और ऊपर से शबाना के किरदार का गेटअप इतना अलग था कि किसी के लिए भी इस रोल को प्ले करना आसान नहीं था. मकड़ी फिल्म में उन्होंने इतना इंटेंस रोल प्ले किया कि मकड़ी के आने की आहट भर से अच्छे-अच्छों की रूह कांप जाया करती थी. जैसे भूथनाथ में अमिताभ बच्चन के घोस्ट वाले किरदार का फनी होना उसकी यूएसपी था उसी तरह मकड़ी में शबाना आजमी के किरदार मकड़ी के आहट का खौफ उसकी यूएसपी था. पूरी फिल्म में उनका सीन उतना ज्यादा नहीं होता है क्योंकि वो आगे जाकर अपीयरेंस में आता है लेकिन पूरी फिल्म की शुरुआत से अंत तक उनका किरदार हावी रहता है और कहीं ना कहीं जहन में एक जगह घर किए होता है.
गॉडमदर
गॉडमदर फिल्म दरअसल शबाना आजमी की वर्सटैलिटी का एक जीता-जागता आईना है. रंभी के रोल में एक महिला के तौर पर एक लेडी डॉन का किरदार निभाना उस समय एकदम नई बात थी. उनका ये रोल काफी चैलेंजिंग था. गॉडमदर फिल्म शबाना का किरदार बताता है कि रोल एडॉप्टबिलिटी के मामले में उनका कोई सानी नहीं है. उनका पार का किरदार गॉडमदर के उनके किरदार से कितना अलग है. इन किरदारों को देखकर ही ऐसा लगता है कि ऐसे ही शबाना आजमी को 5 नेशनल अवार्ड नहीं मिला.

बंटवारा 1947
ये फिल्म 2026 में आई है. बॉक्स ऑफिस पर भी भले ही फिल्म नहीं चली लेकिन इस फिल्म में शबाना आजमी का रोल काफी अहम रहा. फिल्म की कहानी ही उन्हीं के किरदार माई दुर्गा देवी पर बेस्ड है. फिल्म में वे एक ऐसी वृद्ध मां के रोल में हैं जो भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान लाहौर में छूट जाती हैं. उस दौरान गैर मुल्क के लोगों के बीच शबाना आजमी का किरदार कैसे सर्वावाइव करता है उसी पर ये पूरी फिल्म बनी है.
इसमें भी शबाना आजमी को एक बेबस और दुखी महिला का किरदार निभाना था जो टूटने के बाद भी हिम्मत से लड़ने और खुद के अस्तित्व को बचाने की काबिलियत रखती है. इस इमोशन्स को भी चेहरे पर कॉन्टिन्यू शुरू से अंत तक बनाए रखना भी आसान काम नहीं. लेकिन शबाना आजमी ने ये रोल बेखूबी निभाया. खास बात तो ये है बंटवारा 1947 के साथ ही उनकी फिल्म आवारापन 2 भी सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में उन्होंने बंटवारा 1947 के अपने कैरेक्टर से बिल्कुल अलग एक गैंगस्टर का रोल प्ले किया है. ये अपने आप में बताने के लिए काफी है कि शबाना आजमी एक्टिंग की पाठशाला हैं.



