
कैटरीना कैफ और समांथाImage Credit source: Instagram/samantharuthprabhuoffl/
एक तरफ समांथा के चेहरे पर दिख रहे प्रेग्नेंसी ग्लो से जनता आह्लादित हुए जा रही है. उनके बलिहारी जा रही है. वहीं दूसरी तरफ डिलीवरी के बाद नजर आईं कैटरीना कैफ को उनके वजन के कारण जनता ने चारों तरफ से घेर लिया है. गजब क्राइटेरिया है. वैसे तो शब्द पितृसत्तात्मकता, पैट्रिआरकी मुझे बोलने में भी टफ लगता है और अक्सर ओवरयूज्ड भी, लेकिन इस मामले ने समाज की टिपिकल सोच को दिखाया है. जब तक स्त्री के गर्भ में समाज को देने के लिए शिशु है, उसका बढ़ता शारीरिक आकार सौंदर्य है. फिर जैसे ही काम निकला, समाज तुरंत उसे मोटी की संज्ञा दे देगा.
ऐसा प्रेम भाव, ऐसी पसंद को मान्यता ही क्यों, जो आकार के साथ घटे-बढ़े. चिकनी चमेली सबको पसंद है, गेंदे के फूल तो बस ईश्वर या दिवंगत को माला पहनाने के काम ही आएंगे. प्रेम और पूजा को जब तक अलग-अलग रखा जाएगा, कोई भी भाव मन में स्थायी नहीं रहेगा.
डिलीवरी के बाद वजन पर सवाल क्यों?
कहने को तो अपने घर की स्त्रियों को भी लोग फिटनेस के लिए प्रेरित कर सकते हैं, लेकिन जैसे ही वॉक या जिम जाते हुए चार पराठे और दोपहर का खाना बनाकर जाने की बात आएगी, स्त्री खुद हथियार डाल देगी. वो सोच लेंगी उनके इस समर्पण में आप गेंदे का फूल देखेंगे, लेकिन आप तो चिकनी चमेली ढूंढ रहे हैं. आपके घर की स्त्रियों को तो आप अपनी कल्पना के खांचे में फिट कर नहीं पा रहे, इतनी दूर कहां निशाना साध रहे हो ब्रो. उन्हें आठ लोगों के परिवार का दोपहर का खाना भी नहीं बनाना. वो जब चाहेंगी फिट हो जाएंगी.
फिटनेस, पतला और कल्पना का खांचा ये सब अलग-अलग चीजें हैं. सबसे पहले अपवाद पुरूष और स्त्रियां खुद को इससे अलग कर लें, उन पर कोई कटाक्ष नहीं हैं. आप अपने जीवन के मौजूदा समय तक अगर किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में नहीं आए हैं, जिनका उल्लेख यहां है, तो ये पूर्णत: आपका सौभाग्य है, क्योंकि लोग ऐसे होते हैं या ऐसे लोग भी होते हैं.
समाज की सोच का दोहरा पैमाना
हर आदमी को लड़की चाहिए होती है, पूर्ण जतन मनुहार कर वो उसे ब्याह लाता है. फिर वो पत्नी बन जाती है, लेकिन उसे पत्नी तो नहीं चाहिए होती. उसे तो लड़की चाहिए होती है, फिर उसे परिवार चाहिए होता है, पर पत्नी नहीं चाहिए होती. उसे बच्चे चाहिए होते हैं, पर पत्नी नहीं चाहिए होती, उसे लड़की चाहिए होती है. लड़की, लड़की नहीं रह सकती, वो बहू बनती है, मां बनती है, पत्नी बन सकती है, वो सब बन सकती है, लेकिन वापस लड़की नहीं बन सकती, पर आदमी को तो लड़की चाहिए होती है.
बस यहां गेंदे के फूल और चिकनी चमेली का सिद्धांत कहीं खुला, कहीं ढका छुपा सर्वत्र व्याप्त है. बहस होगी, खत्म होगी लेकिन खांचे का क्या? कल्पना में तो वहीं खांचा भरा है. चिकनी चमेली हमेशा पउआ नहीं, कभी प्रेग्नेंसी वेट भी चढ़ा कर आएगी. वरना वहीं फार्मूला अपनाएं, जो ट्रकों के पीछे लिखा होता है- दम है तो पास कर, नहीं तो बर्दाश्त कर.
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