72nd National Film Awards: बेस्ट अवॉर्ड किस तरह की फिल्मों और किरदारों को मिलता है? समझिए

72nd National Film Awards: बेस्ट अवॉर्ड किस तरह की फिल्मों और किरदारों को मिलता है? समझिए

72nd National Film Awards: बेस्ट अवॉर्ड किस तरह की फिल्मों और किरदारों को मिलता है? समझिए

नेशनल फिल्म अवॉर्ड

72nd National Film Awards: सबसे पहले साल 2027 में ऑस्कर अवॉर्ड की रेस में भारत से भेजी गई फिल्म गोंधल (Gondhal) पर एक नज़र डालें. यह मराठी भाषा की फिल्म है. इसे संतोष दावखर (Santosh Davakhar) ने लिखा और निर्देशित किया है. इस फिल्म की चर्चा इसलिए क्योंकि इसकी कहानी और इसके चयन की मंजूरी बताती है आमतौर पर वही सिनेमा प्रशंसित और पुरस्कार के योग्य अनुशंसित होता है जिसमें परंपरा, इतिहास, जिंदगी, समाज और भारतीय मूल्यों को गंभीरता से जगह दी गई हो.

हाल के सिनेमा में पुरानी प्रथाएं नए स्वरूप में लौटी हैं. गोंधल भी उसकी एक कड़ी है. मराठी समाज में गोंधल एक पुरानी प्रथा है. रात में लालटेन जलाकर या रोशनी करके गांव के लोग सामूहिक रूप से बाहर निकलते हैं और परंपरागत अनुष्ठान मनाते हैं- इसे गोंधल कहा जाता है. फिल्म की कहानी की यही बुनियाद है जिसमें अनेक प्रसंग रचे बसे हैं. फिल्म के डायरेक्टर संतोष दावखर पहले ही सिल्वर पीकॉक श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का खिताब जीत चुके हैं. अब इसे 99वें एकेडमी अवॉर्ड्स में एंट्री के लिए भारत की तरफ से ऑफिशियली चुना गया है.

मनोरंजन के साथ मूल्यों की भी बात

गोंधल की चर्चा के बाद सीधे 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की प्रमुख बिंदुओं पर जाऊं उससे पहले थोड़ी सी चर्चा 71वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की कर लेते हैं. पिछला साल याद करें. यही समय था. दिल्ली के विज्ञान भवन में नामचीन सितारे प्रेसिडेंट के हाथों अवॉर्डस लेने पहुंचे थे. नेशनल अवॉर्ड्स के लिहाज से इस साल जिन हिंदी फिल्मों ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा, वे थीं- सैम बहादुर, 12वीं फेल, कटहल, जवान और द केरला स्टोरी आदि. इन फिल्मों का सब्जेक्ट बताता है ये केवल आम मनोरंजन के लिए नहीं बनाई गई थीं बल्कि कमर्शियल ढांचे में भी इनका मकसद स्पष्ट था. सैम बहादुर एक युद्ध नायक की कहानी कहती है तो 12वीं फेल सफलता की रियल स्टोरी है.

रियल लाइफ हीरो पर बनी पूर्व में अन्य फिल्मों की सूची लंबी है- मसलन शेरशाह, उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक, भाग मिल्खा भाग, मैरी कॉम, सुपर 30, मांझी-द माउंटेन मेन, एयरलिफ्ट, नीरजा आदि- ये सभी फिल्में बहु प्रशंसित हैं. कहने का आशय ये कि नेशनल अवॉर्ड्स या अन्य प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स में उन्हीं फिल्मों, गानों, कहानियों, किरदारों और अन्य कलात्मक पक्ष को तवज्जो मिल पाती है, जिसका मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाला विज़न भी हो. खालिस टाइम पास मनोरंजन वाली फिल्में ऐसे अवॉर्ड्स से वंचित रहती हैं.

अब 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की सूची पर नजर डालें तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है. साल 2024 में आई ये फिल्में बड़ी लकीर खींचती दिखती हैं. इनमें मनोरंजक शैली में जागरूकता और प्रेरणा की ऊर्जा भी है. कोई हैरत नहीं कि हाल के समय में फिल्मों में ऐसी कहानियों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है. कोरी काल्पनिक कहानियों के दौर के बाद पहले बायोपिक्स ने जगह बनाई, इसी के साथ अब मिथक और इतिहास ने भी पर्दे पर स्थान बनाना शुरू कर दिया. ऋषभ शेट्टी की कांतारा को नहीं भूला जा सकता. 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में कांतारा को दो बड़े अवॉर्ड मिले- बेस्ट एक्टर और बेस्ट पॉपुलर फिल्म का अवॉर्ड. कांतारा की कहानी में पर्यावरण, विकास और पुरानी प्रथा के टकराव का अनोखा चित्रण हुआ था.

72वें नेशनल अवॉर्ड्स पाने वाली फिल्में

अब साल 2024 के लिए जिन फिल्मों, किरदारों ने नेशनल अवॉर्ड्स प्राप्त किए हैं- वे भी इन्हीं तत्वों से लैस हैं. राजकुमार राव की श्रीकांत, कार्तिक आर्यन की चंदू चैंपियन, यामी गौतम धर की आर्टिकल 370, ममूटी की ब्रह्मयुगम, रणदीप हुड्डा की स्वातंत्र्य वीर सावरकर, लोकप्रिय फिल्मों में कल्कि 2898 एडी, पुष्पा: द रूल पार्ट-2, स्त्री 2 और अमरन के अलावा राष्ट्रीय, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ फिचर फिल्म के तौर पर कैप्टन मिलर (तमिल) ने मजबूत दावेदारी पेश की.

श्रीकांत और चंदू चैंपियन रियल लाइफ हीरो की कहानी है. ये ऐसे लोगों की कहानी है जो जन्मजात दिग्गज नहीं हैं लेकिन ज़मीन से आसमान चूमने की कामयाबी पाने वालों की गाथा है. जो समाज में संघर्षशील लोगों के लिए प्रेरणा बन कर उभरे हैं. तुषार हीरानंदानी निर्देशित और राजकुमार राव अभिनीत यह फिल्म ऐसे नेत्रहीन युवक श्रीकांत बोला की कहानी है, जो गरीब परिवार में जन्मा, लेकिन सपने बड़ा आदमी बनने का देखता है. दृष्टि से दिव्यांग होने के चलते वह उपहास का विषय बनता है और प्रताड़नाएं भी झेलता है. यूनिवर्सिटी में साइंस की पढ़ाई करने और हवाई यात्रा करने तक कानून और सिस्टम से जूझता है. श्रीकांत बोला यह साबित करके दिखाता है कि नेत्रहीन भले हों लेकिन विजन साफ है.

राजकुमार राव श्रीकांत बोला के उस किरदार की आत्मा में समा गए हैं. इस फिल्म का एक अनोखा संवाद है- जानकारी के मुताबिक देश में दो फीसदी नेत्रहीन हैं लेकिन अट्ठानवे फीसदी लोग देखते नहीं हैं।

चंदू चैंपियन और ब्रह्मयुगम की बातें

इसी तरह कार्तिक आर्यन की चंदू चैपियन है. यह फिल्म भारत के पहले पैरालंपिक गोल्ड मेडल विजेता मुरलीकांत पेटकर की बायोपिक है. गुमनाम नायकों की जिंदगी पर फिल्में बनाने का सिलसिला प्रशंसनीय है और इसीलिए वह पुरस्कार पाने की हकदार भी.

इसी तरह ममूटी की मलयालम फिल्म ब्रह्मयुगम में सत्रहवीं शताब्दी के घटना क्रम का फिल्मांकन है. इसे पीरियड ड्रामा नाम दिया गया है, जिसमें लोकजीवन का चित्रण है. दूसरी तरफ यामी गौतम धर की आर्टिकल 370 घाटी की राजनीतिक-सामाजिक दास्तां पेश करती है तो रणदीप हुड्डा स्वातंत्र्य वीर सावरकर की बायोपिक को लेकर आते हैं. फिल्म में वीर सावरकर की संघर्ष यात्रा को दिखाया गया है. मिथक के हिसाब से देखें तो अश्विन नाग निर्देशित कल्कि 2898 एडी भी इसी श्रेणी की फिल्म है. यहां महाभारत के अश्वत्थामा और कल्कि अवतार की परिकल्पना है.

भक्षक और काकोरी की सराहना

जिस भक्षक फिल्म में अभिनय के लिए संजय मिश्रा को बेस्ट सह-अभिनेता का नेशनल अवॉर्ड मिला है, उसकी कहानी को भला कैसे भूल सकते हैं. यह फिल्म बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से प्रेरित है. यानी पर्दे पर एक और सच्ची कहानी. इस फिल्म में मुख्य भूमिका भूमि पेडनेकर ने निभाई थी. इनके अलावा नॉन फीचर श्रेणी में देखें तो कमलेश के. मिश्रा की लिखी और निर्देशित काकोरी आज़ादी की लड़ाई की रोंगटे खड़े कर देने वाली वीर गाथा है. देश को आज़ादी किन कीमतों पर मिली, उसकी एक बहुचर्चित कहानी पेश करती है. तो वहीं बेस्ट डॉक्यूमेंटरी श्रेणी में अतुल पांडे निर्देशित मशहूर शायर निदा फाजली की जिंदगी पर आधारित ‘मैं निदा’ को भी नेशनल अवॉर्ड मिला है.

मिर्जा गालिब से अब तक

गुज़रे ज़माने की भी बात करें तो सन् 1954 में सोहराब मोदी की मिर्जा गालिब और सत्येन बोस की जागृति से लेकर राज कपूर की श्री 420, वी शांताराम की दो आंखें बारह हाथ, के आसिफ की मुगले आजम, बिमल रॉय की बंदिनी, ऋषिकेश मुखर्जी की सत्यकाम और आनंद तो फरहान अख्तर की दिल चाहता है, आर बाल्की की पा, सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी, नितेश तिवारी की छिछोरे और शूजीत सरकार की सरदार उधम आदि जैसी फिल्मों की विषय वस्तु को देखें तो सहज ही समझा जा सकता है कि इन्हें आखिर क्यों नेशनल अवॉर्ड के लिए चुना गया था.

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संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव का पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी में है लेकिन पिछले करीब ढाई दशक से दिल्ली से लेकर मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक का हुनर रखते हैं, देश-विदेश की राजनीति, फिल्म, लिटरेचर, क्राइम जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखते हैं.

आसानी से समझ आने वाली और सोचने-विचारने वाली भाषा लिखना पसंद है. सिनेमा प्रिय विषय है- लिहाजा फिल्मों पर अब तक तीन किताबें, दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिख चुके हैं. कुछेक प्रिंट मीडिया में सब एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश.

सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब 14 साल गुजारा, जहां प्राइम टाइम स्पेशल शोज/प्रोग्राम बनाने से लेकर मुंबई की एंटरटेंमेंट फील्ड में रिपोर्टिंग तक की. उसके बाद सूर्या समाचार, एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 से सम्बद्ध.

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