
अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म हैवान
Akshay Kumar Film Haiwaan Review: अक्षय कुमार, सैफ अली खान, शारिब हाशमी, राजपाल यादव, श्रेया पिलगांवकर और बोमन ईरानी… सिनेमाई जगत के ये सभी बड़े और मंझे हुए नाम हैं. अगर यह स्टारकास्ट किसी फिल्म में साथ आए और फिल्म के निर्देशक प्रियदर्शन जैसे अनुभवी व्यक्ति हों, तो फिल्म तो बेहतरीन होगी ही. बस, यही सोचकर मैं भी थिएटर गई थी. प्रियदर्शन एक ऐसे डायरेक्टर हैं, जिन्हें अपने बेहतरीन ह्यूमर के लिए जाना जाता है, लेकिन उनकी हालिया फिल्म ‘हैवान’ आपको सबसे ज्यादा इसी मोर्चे पर निराश करती है. हमने यह फिल्म देख ली है, आइए जानते हैं कैसी है सैफ और अक्षय की यह नई फिल्म?
सैफ अली खान और अक्षय कुमार, दोनों ही सुपरस्टार्स हैं. अच्छी बात यह है कि जहां अक्षय अपनी फिटनेस की वजह से आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं, वहीं सैफ को ओटीटी ने एक नया जीवन दे दिया है. सैफ और अक्षय पिछली बार साल 2008 की फिल्म ‘टशन’ में एक साथ नजर आए थे (फिल्म में करीना कपूर भी थीं). वह फिल्म फ्लॉप रही थी. अब 18 साल बाद दोनों फिर से साथ आए हैं, लेकिन जिस जादू की उम्मीद इन दोनों सितारों से थी, वह पर्दे पर चल नहीं पाया.
फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी के केंद्र में श्याम (सैफ अली खान का किरदार) है. श्याम बचपन से देख नहीं सकता, लेकिन उसकी यह अक्षमता जिंदगी की रुकावट न बने, इसलिए उसके पिता ने उसे कुश्ती और मां ने संगीत सिखाया, जिससे अब वह अपने परिवार का पालन-पोषण करता है. श्याम की बहन की शादी है और इसके लिए उसे पैसों की सख्त जरूरत है. वह मुंबई की एक हाई-सोसाइटी बिल्डिंग में मेंटेनेंस मैनेजर है और उसे सोसाइटी के हर एक फ्लैट के बारे में भरपूर जानकारी है. वह अच्छी तरह जानता है कि कौन कहां रहता है और किसकी क्या कहानी है. कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब उसी बिल्डिंग में रहने वाले रिटायर्ड चीफ जस्टिस (बोमन ईरानी का किरदार) की उन्हीं के घर में हत्या हो जाती है. अब श्याम को जज साहब की ‘नाजायज’ बेटी को उनके कातिल यानी परशुराम (अक्षय कुमार का किरदार) से हर हाल में बचाना है, जबकि पुलिस खुद श्याम को ही इस मर्डर केस में फंसा देती है.
लद्धड़ स्क्रीनप्ले की भेंट चढ़ी फिल्म
किसी भी फिल्म की जान उसकी कहानी होती है. कहानी का केवल पेपर पर अच्छा होने से ही काम नहीं चल सकता, वो असरदार तभी माना जाएगा, जब वो बड़े पर्दे पर भी उतनी ही कमाल की दिखे. हैवान के साथ ये नहीं होता. ऐसा लगता है, जैसे प्रियदर्शन ने कहानी तो बढ़िया सोची, लेकिन जब वो इसे बनाने चले तो भूल गए कि बनाना क्या चाहते थे. फिल्म का पहला दृष्य एक जेल के सेल का है, जहां दीवार पर कुछ लिखा है. आपको इसे देखकर लगता है कि हां ये शख्स मौत का दूसरा नाम बनकर आएगा, लेकिन जैसे ही कहानी श्याम के किरदार पर जाती है, इसका सारा रस निकल जाता है. फिल्म का एक-एक सीन और डायलॉग बेमतलब लगने लगते हैं. फिल्म का पहला हाफ श्याम के महिमामंडन और महानता के किस्सों से भरा है. एक वक्त के बाद ये इतना खिंच जाता है कि आपका सीट से उठकर कहने का मन करने लगता है कि हां भाई मान लिया कि ये हीरो है, लेकिन आगे भी बढ़ो.
जब भूल भुलैया का सीक्वल आया था, तो लोगों को अचानक प्रियदर्शन साहब के ह्यूमर की याद आ गई थी. इस फिल्म में जोक्स और उनकी प्लेसमेंट देखने के बाद आपको कार्तिक की फिल्म अच्छी लगने लगेगी. फिल्म में जिस किरदार को जोक्स दिए गए है, वो एक पुलिसवाला है जो पहले किसी जोकर से कम नहीं लगता और बाद में एक सीरियस विलेन बन जाता है. एक भी पंच सही से नहीं पड़ता और ऐसा लगता है कि जोक्स के नाम पर मजाक किया गया है. आप पूरी फिल्म में सटल ह्यूमर खोजते हैं लेकिन वो नहीं मिलता. हैवान एक थ्रिलर फिल्म होने वाली थी और इसलिए इसमें विलेन के रोल यानी हैवान के लिए अक्षय ने अपनी आवाज को भारी करने की कोशिश की है. फिल्म देखने के बाद अक्षय को यही सलह दी जा सकती है कि वो फिर कभी भी अपनी आवाज को भारी करने की गलती न करें, क्योंकि वो डरावनी कम और बचकानी ज्यादा लगती है.
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फिल्म खींचने में छूटे पसीने
फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना खराब है कि ऐसा लगता है जैसे कई सारे सीन्स को बस आगे-पीछे रख दिया गया है. न कोई सिर और न कोई पैर. अक्षय के पीछे चलने वाला म्यूजिक और उसपर उनका लुक अच्छा लगता है लेकिन जैसे ही वो डायलॉग बोलते हैं, वैसे ही सब खराब हो जाता है. फिल्म के गाने भी किसी बात का सेंस नहीं बनाते. न उनकी प्लेसिंग और न ही गाने की लिरिक्स, आपको कुछ भी समझ नहीं आता. श्याम के किरदार में सैफ फिल्म को कंधों पर उठाकर चलने की कोशिश करते हैं, लेकिन खराब स्क्रीनप्ले और कहानी के आगे उनकी एक्टिंग भी धरी की धरी रह जाती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो ये फिल्म एक ज्वेलरी ब्रैंड प्लेसमेंट के लिए बनाई गई योजना से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती.



