Pitra Paksha 2026: अष्टमी तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि – pitra paksha 2026 ashtami tithi shradh eighth day of shradh tarpan pind daan Vidhi tvisu

Pitra Paksha 2026: अष्टमी तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि – pitra paksha 2026 ashtami tithi shradh eighth day of shradh tarpan pind daan Vidhi tvisu

पितृपक्ष में 3 सितंबर दिन शनिवार को अष्टमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. अष्टमी तिथि के श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है. यह श्राद्ध उन दिवंगतों के लिए किया जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ हो. इस दिन तर्पण, हवन, पंचबलि और ब्राह्मण भोज की परंपरा बताई गई है. आइए अष्टमी तिथि का समय, श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त और श्राद्ध विधि की प्रक्रिया जानते हैं.

अष्टमी तिथि कब से कब तक?
हिंदू पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी. इसका समापन 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर होगा. श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप मुहूर्त को विशेष माना गया है. 3 अक्टूबर को कुतुप वेला सुबह 11 बजकर 46 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक रहने वाला है.

अष्टमी श्राद्ध की पूजा विधि
पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म के लिए सबसे पहले कुश का आसन तैयार करें. पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें. इसके बाद धूप और दीप जलाएं. देव, ऋषि और पितरों के सामने पुष्प, माला और सुपारी अर्पित करें. फिर एक पात्र या थाली में स्वच्छ जल लें. इसमें काले तिल, कच्चा दूध, जौ और तुलसी पत्र मिलाएं. इसके पास एक अलग खाली पात्र भी रखें.

इसके बाद अनामिका उंगली में कुश से बनी पवित्री धारण करें. इसके बाद हाथ में जल, सुपारी, सिक्का और पुष्प लेकर पितरों के तर्पण का संकल्प लें. तर्पण के जल में गुलाब की पंखुड़ियां मिलाएं. हाथ में अक्षत लेकर देवताओं और ऋषियों का आह्वान करें. इसके बाद मंत्रोच्चार के साथ तर्पण करें. पूजा विधि के अनुसार देव तर्पण पूर्व दिशा और ऋषि तर्पण उत्तर दिशा की ओर मुख करके किया जाता है. पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करने की परंपरा बताई गई है.

श्राद्ध कर्म में हवन भी किया जाता है. अग्नि में गाय के दूध, दही, घी और खीर की आहुति देने की विधि बताई गई है. इसके बाद पंचबलि के तहत गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है. श्राद्ध कर्म के अंत में योग्य ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है. परंपरा के अनुसार दामाद या भांजे को भी भोजन कराया जा सकता है. भोजन के बाद दान-दक्षिणा दी जाती है. इसके बाद परिवार के लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं.

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