The Rise and Fall 2: बिग बॉस से ज्यादा तीखी सियासत या सिर्फ दिखावे का तमाशा? ‘द राइज एंड फॉल 2’ की 5 सबसे बड़ी ताकत और कमजोरियां

The Rise and Fall 2: बिग बॉस से ज्यादा तीखी सियासत या सिर्फ दिखावे का तमाशा? ‘द राइज एंड फॉल 2’ की 5 सबसे बड़ी ताकत और कमजोरियां

The Rise and Fall 2: बिग बॉस से ज्यादा तीखी सियासत या सिर्फ दिखावे का तमाशा? ‘द राइज एंड फॉल 2’ की 5 सबसे बड़ी ताकत और कमजोरियां

राइज एंड फॉल 2 की कमजोरी और ताकत

The Rise and Fall Season 2: ओटीटी की दुनिया में जब भी कोई नया रियलिटी शो आता है, तो दर्शक यही दुआ मांगते हैं कि हे भगवान! वही पुराना रोटी-चावल वाला रोना-धोना और जबरन का लव-एंगल दोबारा न झेलना पड़े. ब्रिटिश कॉन्सेप्ट पर आधारित ‘द राइज एंड फॉल’ का सीजन 2 इसी उम्मीद के साथ लौटा है कि यहां ड्रामा आंसुओं से नहीं, बल्कि दिमाग की शातिर चालों से परोसा जाएगा. एक तरफ पेंटहाउस में मखमली सोफों पर बैठकर हुकूमत चलाते ‘रूलर्स’ और दूसरी तरफ बेसमेंट की सीलन में पसीना बहाते ‘वर्कर्स’.

‘द राइज एंड फॉल’ के पहले सीजन में जहां कॉर्पोरेट बॉस बने अश्नीर ग्रोवर का ‘दोगलापन’ वाला चाबुक चलता था, वहीं इस बार अखाड़े की कमान भारत के पूर्व विस्फोटक ओपनर वीरेंद्र सहवाग के हाथों में है. शो के शुरुआती एपिसोड्स सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या ये सीजन पिछले वाले से बेहतर है या फिर वही पुरानी शराब नई बोतल में डाल दी गई है? अगर आप भी अपने कीमती 42 दिन इस खेल को देने की सोच रहे हैं, तो चाय की चुस्की के साथ पढ़ लीजिए इस सीजन का नफा-नुकसान,

पिछले सीजन से कितना अलग?

पहले सीजन की यूएसपी थी अश्नीर ग्रोवर की वो तीखी डांट, जहां वे कंटेस्टेंट्स को बिल्कुल किसी घाटे में चल रहे स्टार्टअप के फाउंडर की तरह ट्रीट करते थे. उस सीजन में माहौल काफी कॉरपोरेट और कैलकुलेटिव था. लेकिन सीजन 2 पूरी तरह देसी अखाड़ा बन चुका है. यहां खेल सीधा सियासी दंगल में तब्दील हो गया है. सहवाग के आने से माहौल में नजर आने वाला वो टेंशन तो घटा है और हरियाणवी चुटकुलों की मिठास आई है, लेकिन कंटेस्टेंट के बीच के टकराव का लेवल पहले से कहीं ज्यादा निजी और तीखा हो चुका है. वो 5 बातें, जो इस सीजन को बनाती हैं एकदम पैसा वसूल

1. कमाल की कास्टिंग

मेकर्स ने इस बार ऐसी कास्टिंग की है कि देखकर लगता है किसी ने बारूद के ढेर पर माचिस की डिब्बी खोल दी हो. बॉलीवुड से अपनी बेबाकी के लिए मशहूर स्वरा भास्कर, टीवी के एंग्री मैन करण पटेल, बिहार की सियासत का सबसे अनप्रिडिक्टेबल चेहरा तेज प्रताप यादव, डिबेट्स में विपक्ष के पसीने छुड़ाने वाले शहजाद पूनावाला, यूट्यूबर मनीष कश्यप और प्रियंका चाहर चौधरी! ये वो लोग हैं जो असल जिंदगी में एक-दूसरे के विचारों को कोसते रहते हैं, और मेकर्स ने इन्हें एक ही छत के नीचे बंद कर दिया है.

2. जबरदस्त कॉन्सेप्ट

इंसान की फितरत है कि जैसे ही उसके हाथ में सत्ता आती है, उसकी चाल बदल जाती है. पेंटहाउस के रूलर्स जब नीचे बेसमेंट वालों को काम का फरमान सुनाते हैं और बदले में खुद अंगूर खाते हैं, तो स्क्रीन पर समाज की असलियत तैरने लगती है और मजा तब दोगुना हो जाता है जब कोई रूलर एक झटके में लुढ़क कर नीचे गिरता है और उसे वही बेसमेंट का झाड़ू उठाना पड़ता है.

Rise And Fall 1

राइज एंड फॉल सीजन 1

3. सहवाग स्टाइल

सहवाग यहां कोई संजीदा ज्ञान नहीं बांटते. वे बिल्कुल वैसे ही खड़े होते हैं जैसे दिल्ली की किसी नुक्कड़ की दुकान पर ताऊ खड़े होकर मोहल्ले के झगड़े देखते हैं. चेहरे पर वही जानी-पहचानी मुस्कान और जुबान पर ऐसी सीधी फिरकी कि सामने खड़ा कितना भी बड़ा सेलेब हो, वो हंसते-हंसते पानी मांगने लगे.

4. पेंटहाउस की रईसी बनाम बेसमेंट की तंगहाली

टावर का लुक और डिजाइनिंग इस बार और शानदार है. ऊपर पेंटहाउस में बाथटब, लैविश खाना और फाइव-स्टार ठाठ-बाट हैं, तो वहीं नीचे का बेसमेंट ऐसा बनाया गया है जहां 10 मिनट रुकते ही किसी की भी हवा निकल जाए. ये फर्क स्क्रीन पर इतना साफ दिखता है कि दर्शक खुद सोचने लगता है,”भाई, कुछ भी हो जाए, बेसमेंट में नहीं रहना!”

5. धोखेबाजी की तेज रफ्तार

शो की सबसे अच्छी बात ये है कि यहां कोई किसी का सगा नहीं है. सुबह जो हाथ मिलाकर ‘भाई-भाई’ कह रहे थे, शाम के टास्क में वही पीठ में छुरा घोंपते नजर आते हैं. पहले सीजन के मुकाबले इस बार पलटवार बहुत तेजी से हो रहे हैं, जिससे बोरियत का मौका कम मिलता है.

Rise And Fall 2

राइज एंड फॉल 2

वो 5 पेंच, जहां ढीला रह गया खेल

1. नियमों का जलेबी जैसा फेर

मेकर्स को शायद लगता है कि नियम जितने पेचीदा होंगे, शो उतना बुद्धिमान लगेगा. वर्क-शिफ्ट, प्राइज पॉट का गुणा-गणित, एलिमिनेशन की शर्तें और वोटिंग पावर्स इतनी ज्यादा घुमावदार हैं कि आम दर्शक को कई बार कॉपी-पेन लेकर बैठना पड़ता है कि आखिर ये चल क्या रहा है. रियलिटी शो का नियम साफ होना चाहिए, पहेली जैसा नहीं.

2. सहवाग का जरूरत से ज्यादा ठंडा मिजाज

जहां सहवाग की चुटकियां मजेदार हैं, वहीं जब टावर में कंटेस्टेंट्स के बीच मर्यादा तार-तार होती है या हाथ-पैर चलने की नौबत आती है, तो वहां एक कड़क मास्टरजी की कमी खलती है. सहवाग कई बार इतने कूल दिखते हैं कि लगता है मैच ड्रॉ कराने आए हैं, जबकि दर्शक चाहता है कि कोई इनकी क्लास लगाए.

3. रियलिटी शो के ‘पुराने चावल’ और ओवर-एक्टिंग

कुछ चेहरे (खासकर रोडीज और स्प्लिट्सविला वाले) पहले ही दिन से कैमरे की तरफ देखकर बेवजह की चीख-पुकार शुरू कर देते हैं. उनकी यह बनावटी नौटंकी शो के माहौल का जायका बिगाड़ देती है. जब ड्रामा दिल से नहीं, सिर्फ फुटेज के लिए हो, तो दर्शक फौरन भांप लेता है.

4. बेसमेंट वालों की लाचारी का रिपीट टेलीकास्ट

शुरुआती एपिसोड्स में बेसमेंट के टास्क बार-बार एक जैसे लगने लगते हैं. सिर्फ पसीना बहाना और ऊपर वालों के ताने सुनना. अगर बेसमेंट वालों को बगावत करने और तख्तापलट करने के ज्यादा तीखे मौके नहीं दिए गए, तो यह एकतरफा गेम बहुत जल्द थकाऊ लगने लगेगा.

Sehwag Show

सहवाग का शो

5. रोजाना का खिंचाव

हर रोज दोपहर को नया एपिसोड परोसने के चक्कर में कई बार 45 मिनट के एपिसोड में सिर्फ 15 मिनट का काम का मसाला होता है, बाकी समय सिर्फ इधर-उधर की बातें और फुटेज का भराव दिखता है. एडिटिंग को थोड़ा और क्रिस्प बनाया जाता तो बात कुछ और होती.

फैसला –

तो कुल मिलाकर मुद्दा ये है कि क्या ये वाकई ‘बिग बॉस’ से ज्यादा तीखी सियासत है या फिर सिर्फ टीआरपी बटोरने वाला दिखावे का तमाशा? सच कहें तो यह दोनों का मिला-जुला कॉकटेल है. पेंटहाउस की सत्ता, बेसमेंट का पसीना और सहवाग की बेबाक चौपाल इसे देखने लायक तो बनाती है, लेकिन नियमों की उलझन और बनावटी ड्रामे का तड़का कई जगह खेल की रफ्तार सुस्त भी करता है. अगर आप सास-बहू टाइप रोने-धोने से ऊब चुके हैं और ये देखना चाहते हैं कि कैसे कुर्सी मिलते ही अपने भी पराये हो जाते हैं और राजनीति कैसे चलती है, तो यह सीजन आपके लिए एक मजेदार वॉच बन सकता है. फैसला साफ है, अकलमंदी से देखेंगे तो खेल की चालें समझ आएंगी, और हल्के-फुल्के अंदाज में लेंगे तो वीरू भाई की गुगली पर ठहाके लगाने का पूरा जुगाड़ है!

सोनाली नाईक

सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया.

उन्होंने वहां ‘फैशनेरिया’ नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं.

सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है.

नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज ‘पानी’, ‘मेड इन चाइना’ की रीडिंग ‘आल इंडिया रेडियो’ पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

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