भारत रत्न भूपेन हजारिका (जन्म 8 सितंबर 1926, निधन-5 नवंबर 2011 )
Bhupen Hazarika Birth Centenary:भारत रत्न और दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित गायक और संगीतकार भूपेन हजारिका की जन्म शताब्दी है लेकिन ऐसा लगता है उस महान सांस्कृतिक शख्सियत को भुला दिया गया है. जबकि उनकी प्रतिभा असमिया सीमा के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात है. संयोग ही कहिये कि पिछले 3 सितंबर को हमने बांग्ला सिनेमा के महानायक फिल्म अभिनेता उत्तम कुमार की जन्म शती मनाई है. विभिन्न अवसरों पर उनके योगदान को बखूबी याद किया है. ‘नायक’ और ‘अमानुष’ के अभिनेता उत्तम कुमार देश में बांग्ला संस्कृति के प्रतीक थे. तो वहीं भूपेन हजारिका ने असम संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. इस लिहाज से एक ही समय में बांग्ला और असम की दो महान विभूतियों की यादें अनूठी हैं. वैसे भी पश्चिम बंगाल और असम की सांस्कृतिक चेतना में भिन्नता कम ही है.
8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया में जन्में भूपेन हजारिका की शख्सियत फिल्म निर्माण के साथ-साथ गायक-संगीतकार और बतौर लेखक की भी है. उन्हें मरणोपरांत (2019) देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न मिला था. ये बात इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि संगीत कला के क्षेत्र में उनसे पहले महज पांच दिग्गज हस्तियों को भारत रत्न का सम्मान मिला है. उनमें हैं- एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी (कर्नाटक शास्त्रीय गायिका), पं. रविशंकर (विश्व प्रसिद्ध सितार वादक), लता मंगेशकर (पार्श्व गायिका), उस्ताद बिस्मिल्लाह खान (शहनाई वादक) और पं. भीमसेन जोशी (हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक). भूपेन हजारिका के बाद से अब तक इस क्षेत्र में किसी भी हस्ती को भारत रत्न नहीं दिया जा सका है.
देशज आवाज़ का मस्तमौला गायक
भूपेन हजारिका की वैश्विक पहचान बतौर गायक और संगीतकार की है. उनकी आवाज़ बिल्कुल अलहदा थी. एकदम देशज. माटी की महक से लैस और गंगा की हाहाकार भरती लहर-सी. सुर में एक सांस्कृतिक बोध की गहराई है. गायन सुनें तो जितनी कलात्मक प्रतीत होगी, उतनी ही देशज भी. वह पूर्वोत्तर भारत की राष्ट्रीय पहचान हैं. उनके गीतों में जीवन संघर्ष का वितान है. परंपरा से सवाल है तो वर्तमान की पुकार भी. आम जनों की पीड़ा है तो आध्यात्मिक चेतना भी. उनकी जन्मशती पर उनके गाये कई गाने याद आते हैं.
लता और भूपेन ने गाया वह गाना
डायरेक्टर कल्पना लाजमी के साथ उनकी प्रोफेशनल नजदीकी एक खुली किताब है. उन्होंने सन् 1993 में एक फिल्म निर्देशित की- रुदाली. इस फिल्म में कई ख्यात कलाकार थे- मसलन- डिंपल कपाड़िया, राज बब्बर, राखी और अमजद खान आदि. रुदाली ने राष्ट्रीय पुरस्कार, फिल्मफेयर अवॉर्ड समेत कई और पुरस्कार हासिल किए. राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित वह एक अनूठी फिल्म थी, लेकिन उसके गाने अविस्मरणीय है. भूपेन हजारिका और लता मंगेशकर दोनों ने अलग-अलग गुलजार के लिखे गाने- दिल हूम हूम करें… को बड़ी खूबसूरती से गाया था. बेशक लता मंगेशकर के सुर और स्वर में उस गाने को अलग ही विस्तार मिलता है लेकिन भूपेन की आवाज़ में जैसे स्थानीय संस्कृति जीवंत हो उठती है.
हइया ना हइया… की अनोखी ध्वनि
असमिया में भूपेन हजारिका के गाये अनेक अनूठे गाने हैं लेकिन जन्मशती के मौके पर हिंदी में गाए उनके कुछ और कालजयी गाने याद आते हैं. उनका एक गाना है- जिंदगी की आग में काहे को जलाते हो कागजी शरीर को चोला… ये गाना सुनें तो लगता है नाविकों और उनकी तरह जुझारू जिंदगी जीने वालों के संघर्षों की गाथा है. लेकिन उसमें जिस तरह से मौला ओ मौला…या फिर हइया ना हइया… की ध्वनि का इस्तेमाल हुआ है, वह नजरों के सामने गाने का रूपक रच देता है. गाने में भूख मिटाइदे, प्यास हटाइदे, खाली पेट का झोला या फिर कल से बुखार है सर पे सवार है सूरज आग का गोला… जैसी पंक्तियां समाज के निचले तबके की तकलीफ को बयां करती हैं.
गाने में गंगा नदी से भक्त सुलभ सवाल
इसके अलावा भूपेन हजारिका का एक गाना है- गंगा बहती हो क्यों…? उनके इस गाने में मानवतावाद का उद्घोष है. वैसे तो यह गाना भक्ति भाव से परिपूर्ण है लेकिन गंगा की दुर्दशा और गंगा के समक्ष असमानता देख गीतकार की आत्मा चीत्कार कर उठती है. मसलन इतिहास की पुकार, करे हुंकार… ओ गंगा की धार, निर्बल जन को… सबल-संग्रामी, समग्रोगामी… बनाती नहीं हो क्यूं? आस्था के आगे यह ज्वलंत सवाल है. गीतकार सवाल करता है कि गंगा अगर पापों से मुक्ति दिलाती है तो कमजोरों को सबल भी क्यों नहीं बनाती. यह एक ऐसा सवाल है जो सालों से है और ना जाने कितने सालों तक बना रहेगा.
भूपेन हजारिका के ऐसे में ना केवल अध्यात्म बल्कि परिवर्तन की पुकार भी निहित है. असमिया लेखक, फिल्ममेकर और नेशनल अवॉर्ड विजेता उत्पल दत्त कहते हैं- भूपेन हजारिका की शख्सियत के तीन बड़े पहलू हैं- पत्रकारिता, संगीत और फिल्म निर्माण. जिस तरह से तीनों क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं उसी तरह से भूपेन हजारिका के व्यक्तित्व से भी एक दूसरे संपृक्त हैं. तीनों ही क्षेत्रों में उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारी के साथ खुद को स्थापित किया. राष्ट्रीय स्तर पर वे फिल्म निर्देशक की तुलना में संगीत कलाकार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं.
उन्होंने असमिया में लिखा, असमिया गीत गाए और असमिया फिल्मों का निर्देशन भी किया. बाद में बांग्ला और हिंदी में भी गीत गाए. उन्होंने अपने गीतों का बांग्ला और हिंदी में खुद ही अनुवाद किया. उत्पल दत्त बताते हैं- उन्होंने दस फिल्मों का निर्देशन किया, उनहत्तर फिल्मों में संगीत दिया, जिनमें से अनेक फिल्मों के गीत खुद लिखे. जिन फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया उनमें पार्श्वगायन भी किया. अपनी फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं. कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया. यानी वह बहुमूखी प्रतिभा से धनी थे.
रुदाली की तरह अनूठा संगीत रचने का जुनून
भूपेन हजारिका की फिल्मों में कुछ न कुछ कहने की इच्छा दिखाई देती है. संगीत में कुछ अनूठा रचने का उनका जुनून था. लता मंगेशकर, हेमंत कुमार, बलराज साहनी, आशा भोसले जैसी अनेक हस्तियों के साथ काम किया.
अनोखा संयोग है कि 8 सितंबर को ही प्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोसले का भी जन्म दिन होता है. भूपेन हजारिका के साथ आशा भोसले ने भी उनकी फिल्मों में कई गाने गाये हैं. रुदाली में आशा भोसले के दो गाने थे- समय ओ धीरे चलो और बीते ना बीते ना रैना… लेकिन लता मंगेशकर और भूपेन हजारिका का रिश्ता अधिक गहरा था. लता मंगेशकर उनकी संगीत साधना की मुरीद भी थीं.
कल्पना लाजमी और भूपेन हजारिका की जोड़ी
दूसरी तरफ फिल्म निर्देशक कल्पना लाजमी और भूपेन हजारिका के रिश्ते भी कम ख्यात नहीं हैं. कल्पना लाजमी फिल्में निर्देशित करतीं और भूपेन हजारिका उन फिल्मों में संगीत देते. ये रिश्ता बना रहा. कल्पना लाजमी ने सन् 1986 में फिल्म बनाई- एक पल. इसमें शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार थे. तभी से भूपेन हजारिका ने उनकी फिल्मों में संगीत देना शुरू किया. उनकी जोड़ी आगे भी बनी रही. और कई मायनों में चर्चित भी रही. टीवी सीरियल लोहित किनारे के अलावा रुदाली, दरमियां और दमन आदि फिल्मों में दोनों ने साथ-साथ काम किया. उनका निधन 5 नवंबर 2011 को हुआ.
यह भी पढ़ें :Mirzapur The Movie: मनोरंजन का फुल एक्शन ड्रामा तो गद्दी की सियासत का मैसेज भी



