टॉक्सिक का हिंदी का रिव्यू
Toxic Review: जब भी किसी फिल्म के नाम के आगे रॉकिंग स्टार यश का नाम जुड़ जाता है, तब थिएटर के बाहर सिर्फ दर्शकों की लाइनें नहीं लगतीं, बल्कि साथ ही उनकी उम्मीदों का एक पूरा पहाड़ खड़ा हो जाता है. ‘KGF’ जैसी फ्रेंचाइजी देने के बाद जब यश चार साल बाद बड़े पर्दे पर लौट रहे हों, तो जाहिर सी बात है कि पूरा देश सांस थामे बैठा था. लेकिन हुजूर, टिकट की लाइन में लगने से पहले जरा अपनी अपेक्षाओं का चश्मा पोंछ लीजिए! अगर आप ये सोचकर थिएटर का रुख कर रहे हैं कि आपको कोई लव स्टोरी या एक्शन कॉमेडी ड्रामा देखने मिलेगा तो आपका निराश होना तय है.
पर्दा खुलते ही फिल्म यह ऐलान कर देती है कि ये कोई संस्कारी ड्रामा या अमर चित्रकथा के पन्नों से निकली दास्तान नहीं है. ‘टॉक्सिक’ असल में एक ऐसे खूंखार गैंगस्टर की दुनिया है, जिसकी मोहब्बत भी गोलियों की तड़तड़ाहट और धोखे के साए में पनपती है. यहां प्यार सुकून नहीं देता, बल्कि तबाही और दर्द का नया रास्ता खोलता है. 194 मिनट तक चलने वाला ये डार्क और बेचैन करने वाला सफर क्या वाकई ‘रॉकिंग स्टार’ यश के फैंस की कसौटी पर खरा उतरेगा? इसका सही और सटीक जवाब जानने के लिए आपको पूरा रिव्यू पढ़ना होगा.
कहानी
‘टॉक्सिक’ की कहानी किसी एक दशक में सिमटने वाली कहानी नहीं है. ये 1920 के दशक के पुर्तगाली शासन वाले गोवा से शुरू होकर आज़ादी के बाद 1947 और उसके बाद के पांच दशकों तक फैले ड्रग्स, बंदूक और धोखे के साम्राज्य को खंगालती है. फिल्म की शुरुआत होती है एक सर्कस से, जहां एक्रोबैट करने वाली आर्टिस्ट नादिया (कियारा आडवाणी) अपने मासूम जोकर जैसे रंगे चेहरे वाले बेटे को उसके खतरनाक और शराब में डूबे पिता राया (यश) के हवाले करती है. यहां से फ्लैशबैक का जो पहिया घूमता है, वह हमें सीधे गोवा की खूंखार गैंगवार में ले जाता है.
कहानी में एंट्री होती है राया की सख्त बड़ी बहन गंगा (नयनतारा) की, और शुरू होता है पुर्तगाली तस्करों, ड्रग सिंडिकेट्स और पारिवारिक विश्वासघात का ऐसा खूनी खेल जो कई पीढ़ियों तक चलता है. सालों बाद इसी नफरत और बदले की आग से जन्म लेता है राया का बेटा रूमी उर्फ ‘टिकट’ (यश का दूसरा रूप). सत्ता हथियाने से लेकर बाप-बेटे की उस अंदरूनी कड़वाहट तक का ये सफर किस तरह से आगे बढ़ता है ? ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर यश की ‘टॉक्सिक’ देखनी होगी.
यश की टॉक्सिक रिलीज हुई
कैसी है फिल्म?
अगर सीधे शब्दों में कहें, तो टॉक्सिक उन दर्शकों और यश के डाई-हार्ड फैंस के लिए बनाई गई है, जिन्होंने ‘KGF’ में उनके बागी और बेपरवाह अंदाज पर जान छिड़की थी. जो लोग अपने ‘रॉकिंग स्टार’ को सिर्फ एक सीधा-सादा हीरो नहीं, बल्कि स्क्रीन पर राज करने वाले ग्रे-शेड किरदार में देखना पसंद करते हैं, उनके लिए यह एक मुकम्मल दावत है. फिल्म में यश का जो डार्क और नेगेटिव शेड उभरकर सामने आता है, उसे देखकर ऐसा लगता है मानो नितेश तिवारी की ‘रामायण’ में उनके ‘रावण’ वाले किरदार की जमीन अभी से तैयार की जाने लगी हो!
ये कोई रंग-बिरंगी, आसान या खुशियों से भरी कहानी नहीं है, बल्कि एक बेहद डार्क और इंटेंस ड्रामा है जहां एक्शन, भारी-भरकम इमोशन और संगीत का अच्छा कॉकटेल देखने को मिलता है. यहां एक तरफ हमें राया का दिल और उसकी बेइंतहा मोहब्बत दिखती है, तो दूसरी तरफ उसका खौफनाक अतीत और सीने में दबा गहरा पछतावा भी नजर आता है. ये कोई आम गुडी-गुडी प्रेम कहानी नहीं है, और न ही यह उन लोगों के लिए है जो टिपिकल ‘मिल्स एंड बून’ उपन्यासों वाला मासूम और सीधा रोमांस ढूंढते हैं. यहां प्यार में भी ज़हर है, जुनून है और एक ऐसा रिश्ता है जो आपको झकझोर कर रख देता है.
कैसा है डायरेक्शन?
‘मूथॉन’ जैसी फिल्म बना चुकीं निर्देशक गीतू मोहनदास ने इस बार टॉक्सिक के साथ चैलेंजिंग कैनवस चुना है. 1920 के दशक के शिकागो जैसा माफिया माहौल भारत के गोवा में सेट करना कोई आसान काम नहीं था. फिल्म में लंबे ओवरकोट, फेडेरा हैट्स, टॉमी गन्स और विंटेज क्लब्स के साथ नजर आने वाला प्रोडक्शन डिजाइन वाकई इंटरनेशनल लेवल का दिखता है. सिनेमैटोग्राफी बहुत ही रिच और डार्क है, जो एक क्लासिक विंटेज फील देती है. लेकिन इस भव्यता के पीछे सबसे बड़ा रोड़ा बनकर आती है फिल्म की स्क्रीनप्ले और एडिटिंग. 194 मिनट (सवा तीन घंटे से ज्यादा) का ये रनटाइम कई जगहों पर बहुत भारी महसूस होता है. फर्स्ट हाफ में एक के बाद एक कई एक्शन ब्लॉक्स और एडल्ट सीन्स आते हैं, लेकिन वे कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय एक ही जगह घूमते रहते हैं.
एडिटर साहब ने सीन्स को इतनी तेजी से काटा है कि कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा गैंग किसके खिलाफ गोली चला रहा है! इंटरवल तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म एक धांसू मोड़ लेती है, लेकिन सेकंड हाफ में रफ्तार फिर से सुस्त पड़ जाती है. फिल्म का जो असली इमोशनल कनेक्ट होना चाहिए था, वह लगातार चलती गोलियों और स्टाइलिश स्लो-मोशन के शोर में थोड़ा दब जाता है.
यश की टॉक्सिक की लेडीज
एक्टिंग में चला यश का जादू
अगर यह फिल्म 194 मिनट तक अपनी सीट पर बांधे रखती है, तो उसका 90 फीसदी श्रेय जाता है अकेले ‘रॉकिंग स्टार’ यश को! राया के रोल में उनकी दाढ़ी, सिगरेट का धुआं, बेरहम चाल और वो कातिलाना स्वैग उनके फैंस के लिए फुल पैसा-वसूल ट्रीट है. वहीं, फिल्म के आखिरी हिस्से में जब वे छोटी दाढ़ी और अलग हेयरस्टाइल वाले ‘टिकट’ बनकर आते हैं, तो उनकी फुर्ती और एक्शन देखकर समझ आता है कि इस एक्टर में कितनी अलग एनर्जी हैं. यश ने ये साबित कर दिया है कि स्क्रीन पर जब वे आते हैं, तो पूरा फ्रेम उन्हीं के इर्द-गिर्द सिमट जाता है.
कियारा आडवाणी ने नादिया के रोल में अपने करियर की अब तक की सबसे अलग और मैच्यूर एक्टिंग की है. उनके हिस्से का दर्द और गुस्सा बिल्कुल सच्चा लगता है. नयनतारा ने राया की बहन गंगा के रूप में अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से जान फूंकी है, और उनका रॉयल लेकिन खतरनाक अंदाज सीधे प्रभाव छोड़ता है. हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मणि वसंत को हालांकि स्क्रीन पर बहुत ज्यादा वक्त नहीं मिला, पर जितनी देर वो रहीं, उन्होंने इस मर्दाना हिंसा से भरी दुनिया में चल रही कहानी पर अपनी छाप छोड़ी है.
यश की फिल्म
क्यों देखें और क्यों न देखें?
अगर आप एक संस्कारी, हल्की-फुल्की फैमिली फिल्म या साफ-सुथरी प्रेम कहानी की तलाश में हैं, तो ‘टॉक्सिक’ आपके लिए बिल्कुल नहीं है. इसका लंबा रनटाइम, जरूरत से ज्यादा हिंसा और कुछ जगहों पर लड़खड़ाती एडिटिंग आम दर्शकों के सब्र का इम्तिहान ले सकती है. लेकिन अगर आप यश के डाई-हार्ड फैन हैं, जिन्हें पर्दे पर भारी-भरकम ‘बैड बॉय’ स्वैग, रॉकिंग एक्शन और एक डार्क इंटरनेशनल गैंगस्टर दुनिया देखने का जुनून है, तो ये फिल्म आपको निराश नहीं करेगी.
कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक: अ फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स’ एक ऐसी फिल्म है जो डार्क एक्शन फिल्म देखने वाला वर्ग, साउथ की फिल्म पसंद करने वाले दर्शक और यश के लॉयल फैंस के लिए बनाई गई है. इसमें पटकथा के स्तर पर सुस्ती और जरूरत से ज्यादा खींचे गए दृश्यों की खामियां जरूर हैं. लेकिन यश की धमाकेदार अदाकारी, उनका डबल रोल, शानदार विजुअल्स, इंटरवल और क्लाइमैक्स के जोरदार झटके इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाते हैं.



